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Friday, April 22, 2011

भोगे रोग भयं कुले चुत्यी भयं विते न्रुपालाद भयं
मौने देन्य भयं बले रिपु भयं रुपे जराया भयं
शास्त्रे वाद भयं गुणे खल भयं काये कृतांता भयं
सर्व वस्तु भयान्वितम भुवि न्रुनाम वैराग्य मेवा भयं

(भर्तुहरी )
अर्थात : भोग में रोग का भय कुल में भ्रष्ट होने का भय धन में राजा का भय मौन में दीनता का भय बल में शत्रु का भय रूप में वृधावस्था का भय शास्त्र में वाद विवाद का भय गुण में मूर्खो का भय काया में काल का भय ऐसे सर्व वस्तु मनुष्यों को जगत में भयभीत करती हे मात्र वैराग्य ही अभय हे
जय श्रीकृष्ण