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Monday, January 30, 2017

दस महाविद्या

दस महाविद्याओं की अलौकिक शक्ति

1. शक्ति का स्वरूप

शक्ति की उपासना कर सिद्धि को ग्रहण करने के इच्छुक तो बहुत लोग हैं, लेकिन पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ तप कर सिद्धि को प्राप्त करने का साहस सभी के पास नहीं होता। शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने के लिए अघोरी, साधु और भौतिकवाद से दूर हो चुके लोग भी अपना संपूर्ण जीवन झोंक देते हैं।

2. अघोरपंथ

अघोरपंथ में विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए हासिल किया जाता है। प्रमुख रूप से 10 सिद्धियों को जाना गया है, जिनमें से 4 को काली कुल और छ: को श्रीकुल में रखा गया है।

3. तन्मयता की जरूरत

इन सिद्धियों को कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। इसमें जाति, वर्ण, लिंग, उम्र आदि का कुछ भी लेना-देना नहीं है। अपनी तन्मयता और समर्पण भाव के साथ शक्ति को प्रसन्न कर सिद्धियों को प्राप्त किया जाता है, लेकिन इसके लिए जिस मार्ग पर चलना होता है वह बेहद कठिन है।

4. सिद्धियों को प्राप्त करने की प्रकिया

सिद्धियों को प्राप्त करने की शुरुआत करने से पूर्व व्यक्ति को अपनी देह को शुद्ध करना होता है। पवित्र मंत्रों के जाप के दौरान स्नान कर देह का शुद्धिकरण संपन्न होता है। इसके पश्चात जिस स्थान पर बैठकर पूजा करनी है उस स्थान का भी शोधन होता है। इसके बाद शक्ति के जिस स्वरूप को प्राप्त करने के लिए सिद्धि करनी है, उस स्वरूप का पूरी एकाग्रता और तन्मयता के साथ ध्यान किया जाता है।

5. मुख्य सिद्धियां

चलिए आपको बताते हैं कि मुख्य दस सिद्धियां कौन सी हैं और उन्हें हासिल करने से क्या-क्या प्रभाव पड़ता है।

6. काली

देवी कालिका की काले हकीक की माला से 9,11,21 बार जाप करना चाहिए। कालिका की आराधना असाध्य बीमारी से मुक्ति, दुष्ट आत्माओं या क्रूर ग्रहों से बचाव के लिए की जाती है। इसके अलावा अकाल मृत्यु से बचाव और वाक सिद्धि प्राप्त करने के लिए काली की आराधना की जाती है। काली की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं स्वाहा:”।

7. तारा

तारा, जिसे श्मशान तारा के नाम से भी जाना जाता है, की सिद्धि जिसे प्राप्त हो जाती है, वह व्यक्ति मां तारा की गोद में एक बच्चे की तरह रहता है। जिसे श्मशान तारा की कृपा प्राप्त हो जाती है उसका जीवन खुशियों से भर जाता है, श्मशान तारा की सिद्धि प्राप्त करने वाले व्यक्ति को वाक सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है।

8. शत्रुओं की समाप्ति

इसके अलावा श्मशान तारा की कृपा से उसे तीव्र बुद्धि और रचनात्मकता भी हासिल होती है। श्मशान तारा सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं को जड़ से खत्म कर सकता है। श्मशान तारा की आराधना करने के लिए मूंगा, स्फटिक या काले हकीक की माला का प्रयोग करना चाहिए। तारा सिद्धि प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ हीं स्त्रीं हुं फट”।

9. त्रिपुर सुंदरी

संसार का कोई भी कार्य संपन्न करने के लिए त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जानी चाहिए। जिस कार्य को करने में देवता भी सफल नहीं हो पाते, उसे त्रिपुर सुंदरी संपन्न करती है। त्रिपुर सुंदरी के अलावा इस संसार में ऐसी कोई भी साधना नहीं है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। त्रिपुर सुंदरी साधना करने के लिए रुद्राक्ष की माला से दस बार जाप किया जाना चाहिए। त्रिपुर सुंदरी सिद्धि प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:”।

10. भुवनेश्वरी

सुख में वृद्धि करने और किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति करने के लिए भुवनेश्वरी मां की साधना करनी चाहिए। भुवनेश्वरी मां को प्रसन्न करना बेहद आसान है, वह अपने भक्त से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाती हैं। भुवनेश्वरी मां की आराधना करने के लिए स्फटिक की माला से कम से कम 11 या 21 बार जाप करना चाहिए। भुवनेश्वरी मां की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नम:”।

11. छिन्नमस्ता

देवी छिन्नमस्ता बहुत ही जल्द शत्रुओं का विनाश कर सकती हैं। इसके अलावा अवाक सिद्धि, रोजगार में अचूक सफलता, नौकरी में पदोन्नति और कोर्ट केस में सफलता भी हासिल होती है। इसके अलावा पति या पत्नी को अपने वश में रखने के लिए भी देवी छिन्नमस्ता की आराधना की जाती है। छिन्नमस्ता देवी की आराधना रुद्राक्ष या स्फटीक की माला से 11 या 20 बार जाप करना चाहिए। देवी को प्रसन्न करने का मंत्र है

“श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाह”।

12. त्रिपुर भैरवी

किसी भी प्रकार के तांत्रिक समाधान के लिए त्रिपुर भैरवी साधना की जाती है। यह साधना प्रेत आत्माओं के लिए काफी खतरनाक है। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जो आकर्षक जीवनसाथी की ख्वाहिश रखते हैं उनके लिए यह साधना फायदेमंद है। किसी भी बुरे तांत्रिक प्रभाव से मुक्ति और शीघ्र विवाह के लिए भी इस सिद्धि को प्राप्त किया जाता है। मूंगे की माला से त्रिपुर भैरवी की आराधना की जानी चाहिए, इस सिद्धि को प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ ह्रीं भैरवी कलौंह्रीं स्वाहा:”।

13. धूमावती

बुरी नजर और दरिद्रता से मुक्ति, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, भूत-प्रेत के डर से मुक्ति पाने के लिए धूमावती मां की सिद्धि प्राप्त की जाती है। धूमावती देवी, जीवन की हर मुश्किल का समाधान करती है। धूमावती मां की आराधना करने के लिए मोती या काले हकीक की माला से कम से कम नौ बार जाप करना चाहिए। धूमावती मां की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:”।

14. बगलामुखी

हर प्रकार की समस्या का समाधान और किसी भी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए, शत्रुओं का विनाश करने और कोर्ट कचहरी के मसलों में विजय होने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। हल्दी की माला से 8,16 या 21 बार बगलामुखी साधना की जाती है। बगलामुखी साधना का मंत्र है

“ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:”।

15. मातंगी

घर-गृहस्थी के मामलों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए मातंगी आराधना की जाती है। पुत्र प्राप्ति, विवाह में आने वाली परेशानियों के समाधान के लिए मातंगी मां की आराधना की जाती है। मातंगी मां की सिद्धि प्राप्त करने के बाद स्त्री सहयोग जल्दी और आसानी से मिलने लगता है। मातंगी मां की आराधना स्फटिक की माला द्वारा प्रतिदिन 12 बार किया जाना चाहिए। मातंगी आराधना का मंत्र है

“ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी ह्रीं स्वाहा:”।

16. कमला

अखंड धन-दौलत की स्वामिनी देवी कमला की आराधना करने के बाद ही इन्द्र ने अब तक स्वर्ग का शासन संभालकर रखा हुआ है। संसार की सारी खूबसूरती देवी कमला की ही कृपा मानी जाती है। इनकी आराधना करने के लिए कमलगट्टे की माला से कम से कम दस या इक्कीस बार जाप किया जाना चाहिए। देवी कमला की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा।

Tuesday, December 6, 2016

महामृत्युंजय मंत्र


महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों की संख्या से इनमें विविधता आती है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-
एकाक्षरी(1) मंत्र- 'हौं' ।
त्र्यक्षरी(3) मंत्र- 'ॐ जूं सः'।
चतुराक्षरी(4) मंत्र- 'ॐ वं जूं सः'।
नवाक्षरी(9) मंत्र- 'ॐ जूं सः पालय पालय'।
दशाक्षरी(10) मंत्र- 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'।
(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा जबकि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो 'मां' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)
वेदोक्त मंत्र-

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।
इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।
मंत्र विचार :
इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।
शब्द बोधक शब्द बोधक
'त्र' ध्रुव वसु 'यम' अध्वर वसु
'ब' सोम वसु 'कम्‌' वरुण
'य' वायु 'ज' अग्नि
'म' शक्ति 'हे' प्रभास
'सु' वीरभद्र 'ग' शम्भु
'न्धिम' गिरीश 'पु' अजैक
'ष्टि' अहिर्बुध्न्य 'व' पिनाक
'र्ध' भवानी पति 'नम्‌' कापाली
'उ' दिकपति 'र्वा' स्थाणु
'रु' भर्ग 'क' धाता
'मि' अर्यमा 'व' मित्रादित्य
'ब' वरुणादित्य 'न्ध' अंशु
'नात' भगादित्य 'मृ' विवस्वान
'त्यो' इंद्रादित्य 'मु' पूषादिव्य
'क्षी' पर्जन्यादिव्य 'य' त्वष्टा
'मा' विष्णुऽदिव्य 'मृ' प्रजापति
'तात' वषट
इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।
शब्द की शक्ति-
शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति शब्द शक्ति
'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र 'य' यम तथा यज्ञ
'म' मंगल 'ब' बालार्क तेज
'कं' काली का कल्याणकारी बीज 'य' यम तथा यज्ञ
'जा' जालंधरेश 'म' महाशक्ति
'हे' हाकिनो 'सु' सुगन्धि तथा सुर
'गं' गणपति का बीज 'ध' धूमावती का बीज
'म' महेश 'पु' पुण्डरीकाक्ष
'ष्टि' देह में स्थित षटकोण 'व' वाकिनी
'र्ध' धर्म 'नं' नंदी
'उ' उमा 'र्वा' शिव की बाईं शक्ति
'रु' रूप तथा आँसू 'क' कल्याणी
'व' वरुण 'बं' बंदी देवी
'ध' धंदा देवी 'मृ' मृत्युंजय
'त्यो' नित्येश 'क्षी' क्षेमंकरी
'य' यम तथा यज्ञ 'मा' माँग तथा मन्त्रेश
'मृ' मृत्युंजय 'तात' चरणों में स्पर्श
यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-
तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥
संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।
महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥
महामृत्युंजय मंत्र जाप में सावधानियाँ

महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है। लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियाँ रखना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के अनिष्ट की संभावना न रहे।
अतः जप से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-
1. जो भी मंत्र जपना हो उसका जप उच्चारण की शुद्धता से करें।
2. एक निश्चित संख्या में जप करें। पूर्व दिवस में जपे गए मंत्रों से, आगामी दिनों में कम मंत्रों का जप न करें। यदि चाहें तो अधिक जप सकते हैं।
3. मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
4. जप काल में धूप-दीप जलते रहना चाहिए।
5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
6. माला को गोमुखी में रखें। जब तक जप की संख्या पूर्ण न हो, माला को गोमुखी से बाहर न निकालें।
7. जप काल में शिवजी की प्रतिमा, तस्वीर, शिवलिंग

Saturday, September 3, 2016

हरतालिका त्रिज व्रत कथा

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《 *हरतालिका त्रिज व्रत कथा* 》

✡एक बार भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

↪श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

✡तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण परहा।
नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

↪नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

↪तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

✡तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

↪उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

✡तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

↪इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

✡तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

↪तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

✡तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

↪गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

✡हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका।

↪ *इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।*

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Saturday, August 27, 2016

एकादशी

🌷 *अश्वमेघ यज्ञ का फल देनेवाली : अजा एकादशी* 

➡ 27 अगस्त 2016 शनिवार शाम 04:38 से 28 अगस्त 2016 रविवार को शाम 03:21 तक एकादशी है।

💥 *विशेष -* एकादशी का व्रत (उपवास) 28 अगस्त 2016 रविवार को रखे।

🙏🏻 युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।

🙏🏻 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

🙏🏻 पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।

🙏🏻 इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।

🙏🏻 राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया ।

🙏🏻 राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।

🙏🏻 मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी ।

🙏🏻 एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।

🙏🏻 राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।
          🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🏻🌷🌻🍀🌹🌼🌸🌺💐🙏🏻

Tuesday, June 7, 2016

कर्मफल व पुनर्जन्म

*🌷कर्मफल व पुनर्जन्म🌷*

ये रुपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति ।
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात् प्रणुदात्यस्मात् ।।
-(यजु० २/३०)

अर्थ:-जो दुष्ट मनुष्य अपने मन,वचन और शरीर से झूठे आचरण करते हुए अन्याय से अन्य प्राणियों को पीड़ा देकर अपने सुख के लिए दूसरों के पदार्थों को ग्रहण कर लेते हैं,ईश्वर उनको दुःखयुक्त करता है और नीच योनियों में जन्म देता है कि वे अपने पापों के फलों को भोगने के लिए फिर मनुष्य-देह के योग्य होते हैं।इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि ऐसे दुष्ट मनुष्यों वा पापों से बचकर सदैव धर्म का ही सेवन किया करें।

अयं देवाय जन्मने स्तोमो विप्रेभिरासया ।
अकारि रत्नधातमः ।।-(ऋग्वेद १/२०/१)

अर्थ:-मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसे ही उसे जन्म और भोग प्राप्त होते हैं।

अग्रलिखित कथनों से भी पुनर्जन्म की सिद्धि होती है-

जिस समय लक्ष्मण को शक्ति लगती है और वह मूर्च्छित हो जाते हैं,तो श्रीरामचन्द्र जी उसकी इस अचेतन अवस्था को देखकर विलाप करते हुए कहते हैं-

पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि,पापानि कर्माण्यसकृत् कृतानि ।
तत्राद्यायमापतितो विपाको,दुःखेन दुःखं यदहं विशामि ।।-(वाल्मि० रा० यु० ६३/४)

अर्थ:-निश्चय ही मैंने पूर्वजन्म में अनेक बार मनचाहे पाप किए हैं।उन्हीं का फल मुझे आज प्राप्त हुआ है जिससे मैं एक दुःख से दूसरे दुःख को प्राप्त हो रहा हूं।

एक अन्य स्थल पर वर्णित है-सीता की खोज करते हुए हनुमान् लंका में अशोकवाटिका में पहुंचे।उस समय सीता हनुमान् से कहती हैं-

भाग्यवैषम्ययोगेन,पुरा दुश्चरितेन च ।
मयैतत् प्राप्यते सर्वं,स्वकृतं ह्युपभुज्यते ।।-(वा० रा० यु० ११३/३६)

अर्थ:-मैंने पिछले जन्म में जो पाप किये हैं,उसी के परिणामस्वरुप मेरे भाग्य में यह विषमता आ गई है।मैं भी अपने पूर्वकृत फल का भोग प्राप्त कर रही हूँ क्योंकि अपने ही किये का फल भोगना पड़ता है।

महाभारत में भी पुनर्जन्म का उल्लेख मिलता है-दुर्योधन के मारे जाने पर धृतराष्ट्र विलाप करते हुए कहते हैं-

नूनं व्यपकृतं किञ्चिन्मया पूर्वेषु जन्मसु ।
येन मां दुःखभागेषु धाता कर्मसु युक्तवान् ।
परिणामश्च वयसः सर्वबन्धुक्षयश्च मे ।।

अर्थ:-हे कृष्ण ! हमने पूर्व जन्म में निश्चित रुप से बहुत पाप किये हैं इसी कारण विधाता की और से हमें यह दारुण दुःख प्राप्त हुआ है।मैं बूढ़ा हो गया हूं और मेरे सभी बन्धु-बान्धव मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं।

इसी प्रकार गान्धारी भी शोकाकुल होकर कहती है-

नूनमाचरितं पापं मया पूर्वेषु जन्मसु ।
या पश्यामि हतान् पुत्रान् भ्रातृंश्च माधव ।।-(महाभा० अनु० ७)

अर्थ:-हे माधव ! मैंने निश्चित रुप से पिछले जन्म में बहुत-से पाप किए हैं,इसी कारण मैं अपने पुत्रों,पौत्रों और सभी भाइयों को मरा हुआ देख रही हूँ।

इन कथनों से यही सिद्ध होता है कि पूर्वजन्म था,और इस जन्म के बाद दूसरा जन्म भी होगा।इसी प्रकार जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म का चक्र चलता रहता है।