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Friday, February 16, 2018

जन्म नक्षत्र फल

*नक्षत्र जन्म फल* :-
*अश्विनी नक्षत्र* क्षत्र:धनी, हंसमुख, सुंदर, बुद्दिमान, अच्छी पोशाक, आभूषण पहनने का शौक़ीन, गठीला शरीर, जनप्रिय | हर काम में होशियार | परोपकारी, यशस्वी, वाहन एवं नौकर युक्त| भाग्योदय २० वर्ष बाद , यशस्वी, एश्वर्य संपन्न, नम्र स्पष्ट वक्ता अस्थिर चरित्रवान | स्वार्थपूर्ति के लिए विश्वासघात भी कर ले | क्रूर गृह की दशा में सूर्य, मंगल व् गुरु के अंतर में शत्रु कष्ट, चोरी का भय |

*भरणी नक्षत्र* :सत्यवादी, स्वाथ्य अच्छा, बीमार कम रहे | सुमार्ग पर चले, सुखी स्त्रियों में आशक्त, अस्थिर मनोवृत्ति, अस्थिर विचार, विदेश गमन की इच्छा, दीर्घायु, शत्रु विजयी, भाग्योदय २५ वर्ष बाद | कभी चोट लगकर अंग भंग होना संभव | कम बोलने वाला, क्रूर व् कृतघ्न, नीच कर्म रत, क्रूर गृह की महादशा तथा चन्द्र – राहू – शनि की अंतर दशा में शत्रु – कष्ट, चोरी भय |

*कृतिका नक्षत्र* :कामी चरित्र हीन, कंजूस, कृतघ्न, मित्र एवं सम्बन्धियों से बिगाड़ हो | जिस  काम में  हाथ डाले उसे पूरा करके छोड़े | अच्छे भोजन आदि का शौक़ीन | स्त्रियों से मित्रता बढाने में सिद्धहस्त | किसी विशेष विषय में दक्ष | स्वेच्छानुसार कार्य करने वाला | बुद्दिमान लोभी, प्रसिद्ध,तेजस्वी, आशावादी, बाह्य व्यक्तित्व शानदार,  विद्वान देखने में भव्य | मुकदमेबाजी में रूचि रखने वाला चालाक | भाग्योदय २९ वर्ष बाद , क्रूर गृह की दशा तथा मंगल, गुरु, बुध, की अन्तर्दशा में शत्रुकष्ट चोरी का भय |

*रोहिणी नक्षत्र* :सुंदर आकर्षक लुभावना व्यक्तित्व, सत्य एवं मधुर भाषी जनप्रिय कार्य पटु कलाकार सांसारिक कार्य बुद्धि से संपन्न करे दृढ प्रतिज्ञ | रात का जन्म होतो झूठ बोलने वाला | कठोर मन वासना अधिक वासना पूर्ती के लिए कुछ भी कर सकता है | भोगी धन व् स्मरण शक्ति तीव्र , नेत्र बड़े ललाट चौड़ा आलसी भाग्योदय ३० वर्ष के पश्चात | क्रूर गृह की दशा में राहू शनि व् केतु के अंतर में शत्रु कष्ट चोरी का भय |

*मृगशिरा नक्षत्र*  :शोख तबियत स्त्रियों से संपर्क रखे | कामी तीव्र गति से चले घमंडी छोटी छोटी बात पर बिगड़े  क्रोधी चालाक काम निकालने में निपुण | लड़ाई फसाद के कामों में रूचि रखे, प्रियजन के अनादर में खुश रहे, डरपोक विद्वान् विवेकशील यात्रा में रूचि, धन संतान व् मित्रों से युक्त, विद्वान होते हुए भी  चंचल वृत्ति, अभिमान की मात्रा विशेष रहे | भाग्योदय २८ वर्ष पश्चात क्रूर गृह की दशा गुरु – बुध, शुक्र के अंतर में शत्रु – कष्ट चोरी का भय |

*आद्रा नक्षत्र* :नम्र स्वभाव मजबूत दिल बुद्दिमान कोई कष्ट आये तो घबराये नहीं | जो कमाए खर्च हो जाए | अन्नादि का भी संग्रह न हो पाए | धन दौलत के सुख से वंचित रहे | अच्छे कामों में रूचि रखे | विचलित मन मस्तिष्क वाला, बलवान क्षुद्र व् ओछे विचार युक्त कम शिक्षित आडम्बरी धार्मिक कामों में व्यर्थ प्रदर्शन करने वाला | ये प्राय: फिटर ओवेरसिएर, फोरमैन, इंजनीयर इत्यादि होते हैं | भाग्योदय २५ वर्ष बाद में होता है | क्रूर गृह की दशा में शनि – केतु – सूर्य के अंतर में शत्रु – कष्ट चोरी का भय |

*पुनर्वसु नक्षत्र* :बुद्दिमानविद्वान् शीतल स्वभाव बहु मित्रों वाला संतान सुख युक्त, श्वेत वस्तुओं में रूचि, सफर बहुत करे | काव्य प्रेमी माता  पिता का भक्त | आनंदमय जीवन | अपने कार्यों में प्रसिद्धी प्राप्त करे | परोपकारी होते हुए भी स्वस्वार्थ में कमी नहीं आने देता, प्यास खूब लगती है | अहंकारी दुष्ट, दुर्बुद्दी – दुष्कर्मी , मुर्ख परिजन को दुःख व् कष्ट देने वाला गरीब | भाग्योदय २४ वर्ष के पश्चात, क्रूर गृह की दशा में बुध – शुक्र – चन्द्र के अंतर में शत्रु कष्ट चोरी का भय |

*पुष्य नक्षत्र* :बुद्दिमान, सुशील होशियार धर्म में आस्था रखे | कामी दुसरे का काम संवारने का प्रयत्न करे, जो मिले सो खा लेवे | दुसरे की बात शीघ्र समझने वाला | चतुर कार्य दक्ष सुन्दर मेधावी सत्यवादी कुटुंब प्रेमी विशाल ह्रदय माना प्रेमी ईश्वर भक्त राज्य पक्ष से सम्मानित वाक् पटु कार्य कुशल देव – गुरु – अतिथि प्रेमी | द्रढ़ देहि करुण मन | कवि लेखक पत्रकार वकील अध्यन – अध्यापन में रूचि लेने वाला | प्रशासनिक कार्यों में दक्ष वस्त्राभूषण नौकर वाहन युक्त होता है | भाग्योदय ३५ वर्ष पश्चात | समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त, क्रूर गृह की दशा में केतु, सूर्य व् मंगल के अंतर में शत्रु  कष्ट चोरी का भय |

*आश्लेषा नक्षत्र*: नेक कामों की नक़ल करे कुटुंब बड़ा हो साधू संतों की सेवा करे | अपनी अकड में रहे किसी को भी खातिर में नहीं लाये | सदैव अपना फायदा सोचे नेकी बुराई की परवाह नहीं करे, रिश्तेदारों से अनबन रहे शराब आदि में ज्यादा रूचि रखे, झूठा, कृतघ्न धूर्त लम्पट अत्यंत क्रोधी दुराचारी निर्लज्ज शत्रु विजयी औषधी व्यापार में लाभ, परस्त्रीगामी वासना की पूर्ती के लिए निम्नतम काम करने के लिए तैयार हो जाता है  | अविश्वास की  चरम सीमा को पार करने वाला होता है |भाग्योदय  ३० वर्ष पश्चात  होता है क्रूर गृह की महादशा में शुक्र चन्द्र राहु के अंतर में शत्रु कष्ट चोरी का भय होता है |                                                                                                           
*मघा नक्षत्र* :धनवान पत्नी से प्यार करने वाला खुशहाल माता पिता की सेवा करने वाला चतुर व्यवहार कुशल व्यापार में लाभ कमाने वाला, योजनाकार काम पिपासु अस्थिर चित्तवृत्ति किन्तु अत्यंत साहसी | स्वास्थ्य निर्बल रहना घमंडी किन्तु परिश्रमी अपने अहं पूर्ति के लिए कुछ भी करने वाला | धनाड्य किन्तु स्त्रियों में आशक्त रहने वाला व्यर्थ वाद विवाद में समय व्यतीत होना | किसी भी  बात की जड़ तक पहुँचने की क्षमता रखना | भाग्योदय २५ वर्ष के बाद होना | क्रूर गृह की दशा में सूर्य मंगल व् गुरु के अंतर दशा में शत्रु कष्ट एवं चोरी का भय |

*पूर्वा – फाल्गुनी* :इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला शत्रु विजयी, होशियार हर काम में निपुण मृदु भाषी दिलखुश बड़े लोगों से सम्बन्ध रखने वाला | स्त्रियों के लीये आकर्षक विधावान किसी सरकारी काम से सम्बन्ध रखने वाला एवं राजकीय सम्मान पाने  वाला | शफर का शौक़ीन व् दानी होता है |वस्त्राभूषण वाहन धनवान व् संतान युक्त व् नृत्य – संगीत प्रेमी होता है | हंसी  मजाक व् चापलूसी करने में  माहीर होता है | अधिक मित्रवान होता है तथा  सुंदर सुगठित शरीर वाला उग्र स्वभाव वाला नेतृत्व प्रधान जीवन  जीने वाला | भाग्योदय २८ – ३२ वर्ष के बीच में होगा, क्रूर गृह की महादशा में चन्द्र राहु शनि के  अंतर दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय हो सकता है |

*उत्तर – फाल्गुनी* : धनी व् धन इकठ्ठा करने वाला विलासी व् पहलवानी का शौक करने वाला तथा कुशाग्र बुद्धि वाला एवं मृदुभाषी सत्य बोलने वाला, दूसरों का काम दिल से करने वाला अधिक संतान वाला अपनी मेहनत के बल पर धनी बनने वाला | पत्नी से मनमुटाव व् घर में कलेश रहना गृहस्थ जीवन में भाग्योदय ३० – ३२ वर्ष की उम्र में होना | क्रूर गृह  की महादशा में मंगल गुरु व् बुध के अंतर में शत्रु कष्ट चोरी का  भय  हो सकता है |

*हस्त नक्षत्र* :अपनी जाति बिरादरी में मुखिया बन सकता है | विरोधियों से लड़ना झगड़ना, झूठ  व् धोखेबाजी की आदत होना भाई बंधुओं से दूर रहना चरित्र हीन क्रोधी शराबी होना पत्नी रोगी होना व् संतान का गलत आदतों में पड़ना | अशांत मन रहना भाग्यशाली सम्मानित व् सुखी होना निर्दयी होना | आजीवन कलह वाला वातावरण बनाये रखना स्वभाव से क्रूर होना | बुरे कार्य करना डकैती डालना व् हिंसा करना आदि | भाग्योदय ३०- ३२ वर्ष में होना | क्रूर गृह की महादशा में राहु – शनि - केतु के अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय बना रहना |

*चित्रा नक्षत्र* : चित्रा नक्षत्र में जन्म लेने वाला बुद्धिमान साहसी धनवान दानी सुशील शरीर सुन्दर स्त्री व् संतान का सुख पाने वाला होता है | धर्म में आस्था रखने वाला व् आयुर्वेद को जानने वाला, भवन निर्माण में रूचि रखने वाला होता है | सौंदर्य प्रसाधन प्रेमी चित्रकला व् अभिनय का जानकार बहुमूल्य वस्तुओं का व्यापार करने वाला तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, गायन गणित व् औषधियों तथा लेखनकला से धनोपार्जन करने वाला होगा | भाग्योदय ३३ से ३८ वर्ष में होगा | क्रूर गृह की महादशा में गुरु, बुध, शुक्र, के अंतर में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा|

*स्वाति नक्षत्र* : समझदार शीतल स्वभाव मित्रवत  होशियार व् व्यापार में  निपुण  होगा | कुशल व्यवसायी व् व्यापार तथा बौद्धिक कार्यों  द्वारा मनचाहा लाभ अर्जित करना व् यस प्राप्त करना | शिक्षा अधूरी छोड़नी पद सकती है, आर्थिक द्रष्टि से संपन्न व् ऐश्वर्यशाली होगा | अपने समाज में पूर्ण  सम्मान प्राप्त करेगा | इंजीनियर व् टेक्नीकल  कार्य करेगा परोपकारी व् साधू संतों की सेवा करने वाला बनेगा |भाग्योदय ३० से ३६ वर्ष में होगा | क्रूर गृह के महादशा में  शनि, केतु, सूर्य के अंतर में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा |

*विशाखा नक्षत्र* :इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला सुंदर धनवान मगर खोटे कामों में रूचि रखने वाला व् लड़ाई झगडा करने वाला, कृपन लोभी वाक्पटु सामान्य बुद्धि वाला क्रोधी अहंकारी दम्भी कामासक्त शराबी जुआरी स्त्री के वशीभूत होने वाला पाप पुण्य से दूर रहने वाला मतलबी अचानक धन प्राप्त करने वाला शत्रु विजयी |भाग्योदय २१-२८-३४ वर्ष में होगा | कलह पूर्ण जीवन यापन करना | क्रूर गृह के महादशा में बुध, शुक्र, चन्द्र, के अंतर में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा|

*अनुराधा नक्षत्र* : शक्तिशाली व् स्थूल शरीर वाला धनवान मान,सम्मान, पाने वाला, विधा कला व् काम धंधे में निपुण ज्यादा शफर करने वाला होगा | अस्थिर मनोवृत्ति साहसी पराक्रमी मिलनसार  यशस्वी स्वालंबी रौबीला  सुन्दर व्यतित्व का धनी बहुत खाने वाला धार्मिक अध्ययनशील एकांत प्रिय दानी सहिष्णु होगा | सरकारी नौकरी पाने वाल स्वार्थ पूर्ती हेतु छल प्रपंच करने वाला मृदुभाषी स्त्रियों के दिलों में राज करने वाला होगा |  भाग्योदय ३९ वर्ष पश्चात होगा | क्रूर गृह की महादशा में केतु सूर्य मंगल के अंतर में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय  रहेगा

*ज्येष्ठा नक्षत्र*:चतुर सभी कार्यों में होशियार बहुमित्र संतोषी शीतल स्वभाव कला की शौक़ीन क्रोधी धर्म के अनुरूप चलने वाली पराई स्त्री पर आशक्त होने वाला | सम्पूर्ण विधा का ज्ञान प्राप्त करना सुन्दर व्यतित्व वाला अपने कार्य में दक्ष अच्छी संतान प्राप्त करने वाला, गृहस्थ जीवन का अधूरा सुख प्राप्त करने वाला कवि लेखक पत्रकार साहित्यकार प्रशाशक निरीक्षक वकील चार्टर्ड एकाउंटेंट आदि हो सकते हैं | उम्र के २७,३१,४९ वर्ष स्वास्थ्य की द्रष्टि ठीक नहीं रहेंगे| क्रूर गृह की महादशा में शुक्र,चन्द्र,राहु, की अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा |

*मूल नक्षत्र* :विशाल ह्रदय दानी गंभीर धनी अपने समाज में सम्मान पाने वाला कमजोर स्वास्थ्य प्रायः बीमार रहने वाला वाकपटु चतुर  कृतघ्न दुष्ट धूर्त विश्वासघाती स्वार्थी वाचाल लोकप्रिय हिंसक क्रोध करने वाला होता है व् उसके जीवन में बार - बार दुर्घटनाएँ होती हैं | भाग्योदय २७ या ३१ वें वर्ष  में  होता  है | क्रूर गृह की  महादशा में सूर्य मंगल गुरु की अंतर दशाओं में शत्रु कष्ट व् चोरी का  भय रहेगा |

*पूर्वा-आषाढ़ नक्षत्र* :बुद्धिमान उपकारी सबका मित्र सभी कामों में होशियार संतान के प्रति सुखी, उदार स्वाभिमानी, शत्रुहंता, श्रेष्ठ मित्रों वाला अधिक धन नहीं होने पर भी कोई काम नहीं रुकना, भाग्यशाली, कार्य कुशल, यशस्वी, पत्नी का भी पूर्ण सुख रहता है | भाग्योदय २८ वें वर्ष में होता है | क्रूर गृह की महादशा में चन्द्र, राहू, शनि, की अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय होता है |

*उत्तरा-आषाढ़ नक्षत्र* : परोपकारी,मान सम्मान पाने वाला,होशियार, चतुर, बहादुर,संगीत प्रेमी, विनम्र शांत स्वभाव वाला, धार्मिक सुखी, सर्व प्रिय, विद्वान, बुद्धिमान, मेहनती धनी, सट्टेबाजी आदि का शौक पालना, तश्करी एवं अन्य कुसंगति में पड़ना, कामुक व् वेश्यागामी होना, जीवन में अनायास ही धन की प्राप्ति होना | भाग्योदय ३१ वें वर्ष में होगा, क्रूर गृह की महादशा में मंगल,गुरु, बुध, के अंतरदशा में शत्रु-कष्ट व् चोरी का भय रहता है |

*श्रवण नक्षत्र* : धनी बहुत बोलने वाला, गंभीर बुद्धिमान साहसी प्रसिद्द नेकनाम व् पत्नी सुन्दर हो | राग विधा गणित ज्योतिष में लगाव रखे, असंकुचित विचार दुसरे के दिल से भेद पाए | १९ – २४ वा वर्ष खराब रह सकता है | विवेकी विद्वान उच्च विचार धार्मिक शोभायमान व्यक्तित्व, उच्च पदाधिकारी बन सकता है काव्य संगीत में रूचि रखने वाला सिनेमा प्रेमी होगा | क्रूर गृह की महादशा में राहु – शनि – केतु के अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय हो सकता है |

*धनिष्ठा नक्षत्र* : राग विधा में अधिक रूचि रखने वाला होगा | भाई बंधुओं से बहुत प्यार रखे | धनी नेकनाम साहसी अच्छे काम करने वाला व् स्त्री का प्यारा होगा | सरकारी कार्य से सम्बन्ध रहेगा व् जवाहरात पहनने का शौक़ीन होगा तथा लोगों में इज्जत व् मान सम्मान प्राप्त करेगा | १५, १९, २३, वर्ष शुभ नहीं होंगे | धर्मं कर्म में लिप्त रहने वाला एश्वर्या संपन्न उदार व् समाज में सम्मान पाने वाला होगा | वासना ग्रस्त कामुक व् परस्त्रीरत हो सकता है | पत्नी व् पत्नी पक्ष से हमेशा दबा रहेगा लोभी तथा स्त्रियों से लुटने वाला होगा | क्रूर गृह की महादशा में गुरु, बुध, शुक्र, की अंतर दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय हो सकता है |

*शतभिषा नक्षत्र* : धनी सत्यवादी दानी प्रसिद्द अच्छे काम करने वाला बुद्धिमान होशियार सफल शत्रु विजेता इज्जत प्राप्त करने वाला होता है | सरकार से सम्मान प्राप्त करने वाला दूसरी स्त्री से लगाव रखने वाला तथा २८ वाँ वर्ष विशेष महत्वपूर्ण हो सकता है | सत्य भाषी परन्तु जुआरी, व्यसनी सट्टेबाज साहसी परन्तु शांत स्वभाव में कठोरता निडर ज्योतिष प्रेमी साधारण धन एवं दुसरे के माल को हड़पने की इच्छा हमेशा बनी रहती है | क्रूर गृह के महादशा में शनि केतु सूर्य की अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा |

*पूर्वा-भाद्रपद नक्षत्र* : धनी सुंदर बहुत बोलने वाला, विधावान कला कुशल एवं अधिक सोने वाला कई पत्नियों वाला, संतान से सुख प्राप्त करने वाला छोटी छोटी बातों में गुस्सा होने वाला होता है| भाग्योदय १९ से २१ वर्ष में होता है | अपने कार्य में दक्ष व् चतुर तथा धूर्त व् डरपोक धनवान होते हुए भी निर्धन हो जाता है | कम सहन शक्ति वाला विचारों में कामुकता वाला, स्त्रियों से धोखे खाना वाला, पत्नी स्वभाव से चंचंल व् उग्र होती है, गृहस्थ जीवन सामान्य रहेगा | क्रूर गृह के महादशा में बुध, शुक्र, चन्द्र, के अंतर में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय रहेगा |

*उत्तरा-भाद्रपद नक्षत्र* : सुन्दर पराक्रमी साहसी बुद्धिमान रंग गोरा वाचाल दानी शत्रु विजेता धर्मात्मा धनवान होता है | उदार परोपकारी, सुखी, धन-धान्य व् संतान युक्त जीवन | अध्ययनशील, शास्त्रों के ज्ञाता वाक्पटु जिम्मेदार, लेखक, पत्रकार, संगीतज्ञ, सफल गृहस्थ जीवन, म्रदु भाषी पत्नी वाला होता है | भाग्योदय २७ से ३१ वर्ष में संभव है | क्रूर गृह की महादशा में केतु, सूर्य, मंगल, की अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट एवं चोरी का भय रहता है |

*रेवती नक्षत्र* : माता पिता की सेवा करने वाला, बुद्धिमान साधू स्वभाव तेज वाणी व् मित्रों से खुश रहने वाला होता है | शरीर पुष्ट निरोगी काया साहसी एवं सर्वप्रिय धनवान सुपुत्रवान कामातुर सुन्दर चतुर मेधावी, कुशाग्रबुद्धि, सलाह देने में होशियार,अच्छा व्यापारी, कवि लेखक, पत्रकार,निबंधकार, उपन्यासकार आदि होता है| स्वभाव शौम्य दृढ निश्चय वाला, प्रतिभाशाली सर्वगुण संम्पन्न सुन्दर पत्नी वाला चरित्रवान गृह कार्य में दक्ष मधुर भाषी होता है | १७ वें, २१ वें,२४ वें वर्ष ठीक नहीं होंगे | क्रूर गृह की महादशा में शुक्र- चन्द्र – राहु की अन्तर्दशा में शत्रु कष्ट व् चोरी का भय हो सकता |

*अभिजीत नक्षत्र* : अभिजीत नक्षत्र में जन्म लेने वाला सुन्दर होशियार अपराजित दृढ निश्चयी व् भाग्यवान धनवान सर्वगुण संपन्न मेहनत करने वाला शक्तिशाली व्यक्ति होता है।उपरोक्त नक्षत्र बहुत कम उपयोग में लाया जाता है, इसलिए ज्यादातर लोग इसका वर्णन कम ही करते है
माँ ज्योतिष कायँलय

Monday, February 12, 2018

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है
शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

*अर्थात-*

जल से रुद्राभिषेक करने पर —               वृष्टि होती है।
कुशा जल से अभिषेक करने पर —        रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है।
दही से अभिषेक करने पर —                  पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —     लक्ष्मी प्राप्ति
मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए।
तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर —     मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —     बीमारी नष्ट होती है ।
दूध् से अभिषेककरने से   —                   पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण
गंगाजल से अभिषेक करने से —             ज्वर ठीक हो जाता है।
दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू।
घी से अभिषेक करने से —                       वंश विस्तार होती है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।
शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से   —-         पाप क्षय हेतू।
इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद सेसमृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।  साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।

Saturday, January 27, 2018

गुरुस्तोत्रम्

_*गुरुस्तोत्रम्*_
*अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।*
*तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १॥*

*अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।*
*चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ २॥*

*गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।* *गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ३॥*

*स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।* 
*तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ४॥*

*चिन्मयं व्यापि यत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।*
*तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ५॥*

*सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः । वेदान्ताम्बुजसूर्यो यः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६॥*

*चैतन्यश्शाश्वतश्शान्तः व्योमातीतो निरञ्जनः ।*
*बिन्दुनादकलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ७॥*

*ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः । भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ८॥*

*अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मबन्धविदाहिने । आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ९॥*

*शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं सारसम्पदः ।*
*गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १०॥*

*न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।*
*तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ११॥*

*मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।*
*मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १२॥*

*गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् ।*
*गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १३॥*

*त्वमेव माता च पिता त्वमेव*
*त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।*
*त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव ।*
*त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ १४॥*

*🙏🏻॥ इति श्रीगुरुस्तोत्रम् ॥🙏🏻*

Friday, January 19, 2018

बीज मंत्र

बीज मंत्र की महिमा
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ॐ कार मंत्र जैसे दूसरे २० मंत्र और हैं | उनको बोलते हैं बीज मंत्र | उसका अर्थ खोजो तो समझ में नही आएगा लेकिन अंदर की शक्तियों को विकसित कर देते हैं | सब बिज मंत्रो का अपना-अपना प्रभाव होता है | जैसे ॐ कार बीज मंत्र है ऐसे २० दूसरे भी हैं |

ॐ बं ये शिवजी की पूजा में बीज मंत्र लगता है | ये बं बं.... अर्थ को जो तुम बं बं.....जो शिवजी की पूजा में करते हैं | लेकिन बं.... उच्चारण करने से वायु प्रकोप दूर हो जाता है | गठिया ठीक हो जाता है | शिव रात्रि के दिन सवा लाख जप करो बं..... शब्द, गैस ट्रबल कैसी भी हो भाग जाती है |

बीज मंत्र है
खं.... हार्ट-टैक कभी नही होता है | हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही होता | ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है | खं शब्द |
ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा का कं शब्द है | ब्रह्म वाचक | तो ब्रह्म परमात्मा के ३ विशेष मंत्र हैं | ॐ, खं और कं |
ऐसे ही रामजी के आगे भी एक बीज मंत्र लग जाता है | रीं रामाय नम: ||

कृष्ण जी के मंत्र के आगे बीज मंत्र लग जाता है | क्लीं कृष्णाय नम: ||

तो जैसे एक-एक के आगे, एक-एक के साथ मिंडी लगा दो तो १० गुना हो गया | ऐसे ही आरोग्य में भी ॐ हुं विष्णवे नम: | तो हुं बिज मंत्र है | ॐ बिज मंत्र है | विष्णवे..., तो विष्णु भगवान का सुमिरन | ये आरोग्य के मंत्र हैं |

ये जो देवता लोग आशीर्वाद देते हैं अथवा जिनका आशीर्वाद पड़ता है, उनके जीवन में बीज मंत्रो का भी प्रभाव पड़ता है |

मंत्र शास्त्र में बीज मंत्रों का विशेष स्थान है। मंत्रों में भी इन्हें शिरोमणि माना जाता है क्योंकि जिस प्रकार बीज से पौधों और वृक्षों की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार बीज मंत्रों के जप से भक्तों को दैवीय ऊर्जा मिलती है।

ऐसा नहीं है कि हर देवी-देवता के लिए एक ही बीज मंत्र का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है। बल्कि अलग-अलग देवी-देवता के लिए अलग बीज मंत्र हैं।

“ऐं” सरस्वती बीज । यह मां सरस्वती का बीज मंत्र है, इसे वाग् बीज भी कहते हैं। जब बौद्धिक कार्यों में सफलता की कामना हो, तो यह मंत्र उपयोगी होता है। जब विद्या, ज्ञान व वाक् सिद्धि की कामना हो, तो श्वेत आसान पर पूर्वाभिमुख बैठकर स्फटिक की माला से नित्य इस बीज मंत्र का एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“ह्रीं” भुवनेश्वरी बीज । यह मां भुवनेश्वरी का बीज मंत्र है। इसे माया बीज कहते हैं। जब शक्ति, सुरक्षा, पराक्रम, लक्ष्मी व देवी कृपा की प्राप्ति हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“क्लीं” काम बीज । यह कामदेव, कृष्ण व काली इन तीनों का बीज मंत्र है। जब सर्व कार्य सिद्धि व सौंदर्य प्राप्ति की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“श्रीं” लक्ष्मी बीज । यह मां लक्ष्मी का बीज मंत्र है। जब धन, संपत्ति, सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पश्चिम मुख होकर कमलगट्टे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

"ह्रौं" शिव बीज । यह भगवान शिव का बीज मंत्र है। अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग नाश, चहुमुखी विकास व मोक्ष की कामना के लिए श्वेत आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

"गं" गणेश बीज । यह गणपति का बीज मंत्र है। विघ्नों को दूर करने तथा धन-संपदा की प्राप्ति के लिए पीले रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

"श्रौं" नृसिंह बीज । यह भगवान नृसिंह का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, सर्व रक्षा बल, पराक्रम व आत्मविश्वास की वृद्धि के लिए लाल रंग के आसन पर दक्षिणाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या मूंगे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“क्रीं” काली बीज । यह काली का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, पराक्रम, सुरक्षा, स्वास्थ्य लाभ आदि कामनाओं की पूर्ति के लिए लाल रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“दं” विष्णु बीज । यह भगवान विष्णु का बीज मंत्र है। धन, संपत्ति, सुरक्षा, दांपत्य सुख, मोक्ष व विजय की कामना हेतु पीले रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर तुलसी की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

Monday, January 30, 2017

दस महाविद्या

दस महाविद्याओं की अलौकिक शक्ति

1. शक्ति का स्वरूप

शक्ति की उपासना कर सिद्धि को ग्रहण करने के इच्छुक तो बहुत लोग हैं, लेकिन पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ तप कर सिद्धि को प्राप्त करने का साहस सभी के पास नहीं होता। शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने के लिए अघोरी, साधु और भौतिकवाद से दूर हो चुके लोग भी अपना संपूर्ण जीवन झोंक देते हैं।

2. अघोरपंथ

अघोरपंथ में विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए हासिल किया जाता है। प्रमुख रूप से 10 सिद्धियों को जाना गया है, जिनमें से 4 को काली कुल और छ: को श्रीकुल में रखा गया है।

3. तन्मयता की जरूरत

इन सिद्धियों को कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। इसमें जाति, वर्ण, लिंग, उम्र आदि का कुछ भी लेना-देना नहीं है। अपनी तन्मयता और समर्पण भाव के साथ शक्ति को प्रसन्न कर सिद्धियों को प्राप्त किया जाता है, लेकिन इसके लिए जिस मार्ग पर चलना होता है वह बेहद कठिन है।

4. सिद्धियों को प्राप्त करने की प्रकिया

सिद्धियों को प्राप्त करने की शुरुआत करने से पूर्व व्यक्ति को अपनी देह को शुद्ध करना होता है। पवित्र मंत्रों के जाप के दौरान स्नान कर देह का शुद्धिकरण संपन्न होता है। इसके पश्चात जिस स्थान पर बैठकर पूजा करनी है उस स्थान का भी शोधन होता है। इसके बाद शक्ति के जिस स्वरूप को प्राप्त करने के लिए सिद्धि करनी है, उस स्वरूप का पूरी एकाग्रता और तन्मयता के साथ ध्यान किया जाता है।

5. मुख्य सिद्धियां

चलिए आपको बताते हैं कि मुख्य दस सिद्धियां कौन सी हैं और उन्हें हासिल करने से क्या-क्या प्रभाव पड़ता है।

6. काली

देवी कालिका की काले हकीक की माला से 9,11,21 बार जाप करना चाहिए। कालिका की आराधना असाध्य बीमारी से मुक्ति, दुष्ट आत्माओं या क्रूर ग्रहों से बचाव के लिए की जाती है। इसके अलावा अकाल मृत्यु से बचाव और वाक सिद्धि प्राप्त करने के लिए काली की आराधना की जाती है। काली की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं स्वाहा:”।

7. तारा

तारा, जिसे श्मशान तारा के नाम से भी जाना जाता है, की सिद्धि जिसे प्राप्त हो जाती है, वह व्यक्ति मां तारा की गोद में एक बच्चे की तरह रहता है। जिसे श्मशान तारा की कृपा प्राप्त हो जाती है उसका जीवन खुशियों से भर जाता है, श्मशान तारा की सिद्धि प्राप्त करने वाले व्यक्ति को वाक सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है।

8. शत्रुओं की समाप्ति

इसके अलावा श्मशान तारा की कृपा से उसे तीव्र बुद्धि और रचनात्मकता भी हासिल होती है। श्मशान तारा सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं को जड़ से खत्म कर सकता है। श्मशान तारा की आराधना करने के लिए मूंगा, स्फटिक या काले हकीक की माला का प्रयोग करना चाहिए। तारा सिद्धि प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ हीं स्त्रीं हुं फट”।

9. त्रिपुर सुंदरी

संसार का कोई भी कार्य संपन्न करने के लिए त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जानी चाहिए। जिस कार्य को करने में देवता भी सफल नहीं हो पाते, उसे त्रिपुर सुंदरी संपन्न करती है। त्रिपुर सुंदरी के अलावा इस संसार में ऐसी कोई भी साधना नहीं है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। त्रिपुर सुंदरी साधना करने के लिए रुद्राक्ष की माला से दस बार जाप किया जाना चाहिए। त्रिपुर सुंदरी सिद्धि प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:”।

10. भुवनेश्वरी

सुख में वृद्धि करने और किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति करने के लिए भुवनेश्वरी मां की साधना करनी चाहिए। भुवनेश्वरी मां को प्रसन्न करना बेहद आसान है, वह अपने भक्त से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाती हैं। भुवनेश्वरी मां की आराधना करने के लिए स्फटिक की माला से कम से कम 11 या 21 बार जाप करना चाहिए। भुवनेश्वरी मां की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नम:”।

11. छिन्नमस्ता

देवी छिन्नमस्ता बहुत ही जल्द शत्रुओं का विनाश कर सकती हैं। इसके अलावा अवाक सिद्धि, रोजगार में अचूक सफलता, नौकरी में पदोन्नति और कोर्ट केस में सफलता भी हासिल होती है। इसके अलावा पति या पत्नी को अपने वश में रखने के लिए भी देवी छिन्नमस्ता की आराधना की जाती है। छिन्नमस्ता देवी की आराधना रुद्राक्ष या स्फटीक की माला से 11 या 20 बार जाप करना चाहिए। देवी को प्रसन्न करने का मंत्र है

“श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाह”।

12. त्रिपुर भैरवी

किसी भी प्रकार के तांत्रिक समाधान के लिए त्रिपुर भैरवी साधना की जाती है। यह साधना प्रेत आत्माओं के लिए काफी खतरनाक है। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जो आकर्षक जीवनसाथी की ख्वाहिश रखते हैं उनके लिए यह साधना फायदेमंद है। किसी भी बुरे तांत्रिक प्रभाव से मुक्ति और शीघ्र विवाह के लिए भी इस सिद्धि को प्राप्त किया जाता है। मूंगे की माला से त्रिपुर भैरवी की आराधना की जानी चाहिए, इस सिद्धि को प्राप्त करने का मंत्र है

“ॐ ह्रीं भैरवी कलौंह्रीं स्वाहा:”।

13. धूमावती

बुरी नजर और दरिद्रता से मुक्ति, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, भूत-प्रेत के डर से मुक्ति पाने के लिए धूमावती मां की सिद्धि प्राप्त की जाती है। धूमावती देवी, जीवन की हर मुश्किल का समाधान करती है। धूमावती मां की आराधना करने के लिए मोती या काले हकीक की माला से कम से कम नौ बार जाप करना चाहिए। धूमावती मां की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:”।

14. बगलामुखी

हर प्रकार की समस्या का समाधान और किसी भी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए, शत्रुओं का विनाश करने और कोर्ट कचहरी के मसलों में विजय होने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। हल्दी की माला से 8,16 या 21 बार बगलामुखी साधना की जाती है। बगलामुखी साधना का मंत्र है

“ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:”।

15. मातंगी

घर-गृहस्थी के मामलों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए मातंगी आराधना की जाती है। पुत्र प्राप्ति, विवाह में आने वाली परेशानियों के समाधान के लिए मातंगी मां की आराधना की जाती है। मातंगी मां की सिद्धि प्राप्त करने के बाद स्त्री सहयोग जल्दी और आसानी से मिलने लगता है। मातंगी मां की आराधना स्फटिक की माला द्वारा प्रतिदिन 12 बार किया जाना चाहिए। मातंगी आराधना का मंत्र है

“ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी ह्रीं स्वाहा:”।

16. कमला

अखंड धन-दौलत की स्वामिनी देवी कमला की आराधना करने के बाद ही इन्द्र ने अब तक स्वर्ग का शासन संभालकर रखा हुआ है। संसार की सारी खूबसूरती देवी कमला की ही कृपा मानी जाती है। इनकी आराधना करने के लिए कमलगट्टे की माला से कम से कम दस या इक्कीस बार जाप किया जाना चाहिए। देवी कमला की आराधना करने का मंत्र है

“ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा।

Tuesday, December 6, 2016

महामृत्युंजय मंत्र


महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों की संख्या से इनमें विविधता आती है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-
एकाक्षरी(1) मंत्र- 'हौं' ।
त्र्यक्षरी(3) मंत्र- 'ॐ जूं सः'।
चतुराक्षरी(4) मंत्र- 'ॐ वं जूं सः'।
नवाक्षरी(9) मंत्र- 'ॐ जूं सः पालय पालय'।
दशाक्षरी(10) मंत्र- 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'।
(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा जबकि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो 'मां' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)
वेदोक्त मंत्र-

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।
इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।
मंत्र विचार :
इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।
शब्द बोधक शब्द बोधक
'त्र' ध्रुव वसु 'यम' अध्वर वसु
'ब' सोम वसु 'कम्‌' वरुण
'य' वायु 'ज' अग्नि
'म' शक्ति 'हे' प्रभास
'सु' वीरभद्र 'ग' शम्भु
'न्धिम' गिरीश 'पु' अजैक
'ष्टि' अहिर्बुध्न्य 'व' पिनाक
'र्ध' भवानी पति 'नम्‌' कापाली
'उ' दिकपति 'र्वा' स्थाणु
'रु' भर्ग 'क' धाता
'मि' अर्यमा 'व' मित्रादित्य
'ब' वरुणादित्य 'न्ध' अंशु
'नात' भगादित्य 'मृ' विवस्वान
'त्यो' इंद्रादित्य 'मु' पूषादिव्य
'क्षी' पर्जन्यादिव्य 'य' त्वष्टा
'मा' विष्णुऽदिव्य 'मृ' प्रजापति
'तात' वषट
इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।
शब्द की शक्ति-
शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति शब्द शक्ति
'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र 'य' यम तथा यज्ञ
'म' मंगल 'ब' बालार्क तेज
'कं' काली का कल्याणकारी बीज 'य' यम तथा यज्ञ
'जा' जालंधरेश 'म' महाशक्ति
'हे' हाकिनो 'सु' सुगन्धि तथा सुर
'गं' गणपति का बीज 'ध' धूमावती का बीज
'म' महेश 'पु' पुण्डरीकाक्ष
'ष्टि' देह में स्थित षटकोण 'व' वाकिनी
'र्ध' धर्म 'नं' नंदी
'उ' उमा 'र्वा' शिव की बाईं शक्ति
'रु' रूप तथा आँसू 'क' कल्याणी
'व' वरुण 'बं' बंदी देवी
'ध' धंदा देवी 'मृ' मृत्युंजय
'त्यो' नित्येश 'क्षी' क्षेमंकरी
'य' यम तथा यज्ञ 'मा' माँग तथा मन्त्रेश
'मृ' मृत्युंजय 'तात' चरणों में स्पर्श
यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-
तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥
संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।
महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥
महामृत्युंजय मंत्र जाप में सावधानियाँ

महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है। लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियाँ रखना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के अनिष्ट की संभावना न रहे।
अतः जप से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-
1. जो भी मंत्र जपना हो उसका जप उच्चारण की शुद्धता से करें।
2. एक निश्चित संख्या में जप करें। पूर्व दिवस में जपे गए मंत्रों से, आगामी दिनों में कम मंत्रों का जप न करें। यदि चाहें तो अधिक जप सकते हैं।
3. मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
4. जप काल में धूप-दीप जलते रहना चाहिए।
5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
6. माला को गोमुखी में रखें। जब तक जप की संख्या पूर्ण न हो, माला को गोमुखी से बाहर न निकालें।
7. जप काल में शिवजी की प्रतिमा, तस्वीर, शिवलिंग