Search This Blog

Wednesday, July 8, 2015

कुण्ड एवं मण्डप निर्माण

कुण्ड एवं मण्डप निर्माण

यज्ञ का मण्डप एवं कुण्ड बहुत ही सुन्दर तथा सुव्यवस्थित बने हुए
तथा कलापूर्ण सुन्दरता के साथ सजे हुए होने चाहिए । कलापूर्ण
वस्तुएँ, सुरुचिकर, आकर्षक एवं शोभनीय प्रतीत होती हैं, उनमें
चित्त लगता है । कार्यकर्त्ताओं तथा दर्शकों का मन लगता है,

चित्त प्रसन्न होता है तथा उत्साह बढ़ता है ।

इसलिए ज्यों-ज्यों, उल्टे-तिरछे कुण्ड-मण्डप बना लेने का निषेध
किया गया है और इस बात पर जोर दिया गया है, कि कला-
व्यवस्था, नाप-तौल, सौन्दर्य, शोभा आदि का ध्यान रखकर
ही इनका निर्माण किया जाय ।

यज्ञ का मण्डप किस प्रकार बनाया जाय तथा कुण्ड किस
प्रकार तैयार किये जायँ, इस सम्बन्ध में अनेक स्वतन्त्र प्राचीन
पुस्तकें उपलब्ध हैं ।

(१) विट्ठल दीक्षित कृत-कुण्डार्क
(२) शङ्कर भट्ठ कृत-
कुण्डार्क
(३) नारायण भट्ठ कृत- कुण्डदर्पण (४) अनन्त देवज्ञ
कृत-"कुण्ड मर्त्तण्ड
(५) विश्वनाथ कृत कुण्ड कौमुदी
(६)
लक्ष्मीधर भट्ठ कृत कुण्ड कारिक
(७) कुण्ड शुल्व कारिका
(८)
महादेव गुरुकृत-कुण्ड प्रदीप
(९) रामचन्द्रचार्य कृत-कुण्डोदधि
(१०) द्विवेदी विश्वनाथ कृत-कुण्ड रत्नाकर
(११) श्रीधर कृत-
कुण्डार्णव
(१२) गङ्गाधर कृत-कुण्डांकुश
(१३) नीलकंठ कृत-
कुण्डोद्योत
(१४) नारद कृत- कुण्ड नारद पंच गात्रम
(१५) बलभद्र
कृत- कुण्ड कल्पद्रुम
(१६) शुल्क माधवा कृत-कुण्ड कल्पद्रम
(१७)
कुण्ड रचना (१८) परशुराम कृत-परशुराम पद्धत्युक्त कुण्ड मण्डप
(१९) राम वाजपेयी कृत-कुण्ड राम वाजपेयी" (२०) विष्णु भट्ठ
कृत-कुण्ड मरीचित माला" (२१) नारायण सुतानन्द भट्ठ कृत-
कुण्ड मण्डप दर्पण (२२) नैमिष वासी रामचन्द्र कृत-कुण्ड श्लोक
प्रकाशिका (२३) आपदेव कृत-खेट पीठ माला (२४) नवकुण्डी
विधान (२५) सप्तष नृहरि दैवज्ञ कृत-कुण्ड मण्डप प्रकाशिका
(२६) कुण्डशुदि (२७) सूक्ष्म गणिततानीत कुण्ड मण्डप परिमाण,
विचार (२८) रामचन्द्र दीक्षित कृत-कुण्ड रत्नावली (२९)
परशुराम भट्ठ कृत-पद्मकुण्ड कोष (३०) रामकृष्ण दीक्षित कृत-
कुण्ड मण्डप पद्धति (३१) कुण्ड लक्षणम्ा् (३२)
शिवरामोपाध्याय कृत-कुण्डार्क दीधिति (३३) कृष्ण
दीक्षित कृत-मण्डार्क पद्मिनी (३४) दामोर सूरि कृत-
कुण्डार्क नौका (३५) कुण्डार्क मिताक्षरा (३६) श्रीधर
शास्त्री कृत कुण्डार्क सुप्रभा (३७) करंजकर दीक्षित कृत
कुण्डर्कोदय (३८) मयूरेश्वरोपाध्याय कृत-वेदी पद्धति (३९)

घुण्डी राज कृत-सामान्य निर्णय कर्म निर्णय आदि अनेक
पुस्तकों में अनेक प्रकार के कुण्ड तथा मण्डप बनाने के विधान,
आकार तथा नियम लिखे हुए हैं ।

मण्डपों के निर्माण में द्वार, खम्भे, तोरण द्वार, ध्वजा, शिखर,
छादन, रङ्गीन वस्त्र आदि वर्णन हैं ।

इनके वस्तु भेद, रङ्ग भेद, नाप
दिशा आदि के विधान बताए गए हैं ।

मण्डपों के नाम भी अलग-
अलग-प्रयोग विशेष के आधार पर लिखे गये हैं । कुण्डों में चतुरस्र
कुण्ड, योनि कुण्ड, अर्ध चन्द्र कुण्ड, अष्टास्त्र कुण्ड, सप्तास्त्र
कुण्ड, पञ्चास्त्र कुण्ड, आदि अनेक प्रकार के कुण्डों के खोदने के
अनेक विधान हैं ।

कुण्डों के साथ में योनियाँ लगाने का वर्णन है
। योनियों के भेद-उपभेद एवं अन्तरों का विवेचन है । इन सबका
उपयोग बहुत बड़े यज्ञों में ही सम्भव है । इसी प्रकार अनेक देव-
देवियाँ यज्ञ मण्डप के मध्य तथा दिशाओं में स्थापित की
जाती हैं ।

साधारण यज्ञों को सरल एवं सर्वोपयोगी बनाने के लिए मोटे
आधार पर ही काम करना होगा ।

मण्डप की अपने साधन और
सुविधाओं की दृष्टि से पूरी-पूरी सजावट करनी चाहिये और
उसके बनाने में कलाप्रियता, कारीगरी एवं सुरुचि का परिचय
देना चाहिए । रंगीन वस्त्रों, रंगीन कागजों, केले के पेड़ों आम्र
पल्लवों, पुष्पों, खम्भों, द्वारों, चित्रों, ध्वजाओं, आदर्श
वाक्यों, फल आदि के लटकनों से उसे भली प्रकार सजाना
चाहिए ।

वेदी का कुण्ड जो कुछ भी बनाया जाय, टेका-
तिरछा न हो । उसकी लम्बाई-चौड़ाई तथा गोलाई सधी हुई
हो । कुण्ड या वेदी को रंगविरंगे चौक पूर कर सुन्दर बनाना
चाहिये ।

पिसी हुई मेंहदी से हरा रंग, पिसी हल्दी से पीला रंग, आटे से
सफेद रंग, गुलाल या रोली से लाल रंग की रेखाएँ खींचकर, चौक
को सुन्दर बनाया जा सकता है ।

सर्वतोभद्र, देव-स्थापना की
चौकियाँ या वेदियाँ, कलश, जल घट, आसन आदि को बनाने या
रखने में भी सौन्दर्य एवं शोभा का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।

जिस प्रकार देव मन्दिरों में भगवान की प्रतिमा नाना प्रकार
के वस्त्रों, आभूषणों, एवं श्रंङ्गारों से सजाई जाती है, उसी
प्रकार यज्ञ भगवान की शोभा के लिए भी पूरी तत्परता
दिखाई जानी चाहिये । कुण्ड और मण्डप-निर्माण के विधि-
विधानों में जहाँ विज्ञान का समावेश है, वहाँ शोभा,
सजावट, कला एवं सुरुचि प्रदर्शन भी एक महत्वपूर्ण कारण है ।

☆ कुण्ड और मण्डपों के सम्बन्ध में इस प्रकार के उल्लेख ग्रन्थों में
मिलते हैः-

बड़े यज्ञों में ३२ हाथ (४८ फुट) ३६ फुट अर्थात १६ = २४ फुट का
चौकोर मण्डप बनाना चाहिये ।

मध्यम कोटि के यज्ञों में १४
(१८ फुट) हाथ अथवा १२ हाथ (१८ फुट) का पर्प्याप्त है । छोटे
यज्ञों में १० हाथ (१५ फुट ) या ८ (१२ फुट) हाथ की लम्बाई
चौडाई का पर्याप्त है ।

मण्डप की चबूतरी जमीन से एक हाथ
या आधा हाथ ऊँची रहनी चाहिए ।

बड़े मण्डपों की मजबूती के
लिए १६ खंभे लगाने चाहिये । खम्भों को रङ्गीन वस्त्रों से
लपेटा जाना चाहिए । मण्डप के लिये प्रतीक वृक्षों की लकड़ी
तथा बाँस का प्रयोग करना चाहिए ।

मण्डप के एक हाथ बाहर चारों दिशाओं में ४ तोरण द्वार होते हैं,
यह ७ हाथ (१० फुट ६ इंच) उँचे और ३.५ चौड़े होने चाहिए ।

इन
तोरण द्वारों में से पूर्व द्वार पर शङ्क, दक्षिण वाले पर चक्र,
पच्छिम में गदा और उत्तर में पद्म बनाने चाहिए ।

इन द्वारों में
पूर्व में पीपल, पच्छिम में गूलर-उत्तर में पाकर, दक्षिण में बरगद की
लकड़ी लगाना चाहिए, यदि चारों न मिलें तो इनमें से किसी
भी प्रकार की चारों दिशाओं में लगाई जा सकती है ।

पूर्व के
तोरण में लाल वस्त्र, दक्षिण के तोरण में काला वस्त्र, पच्छिम
के तोरण में सफेद वस्त्र, उत्तर के तोरण में पीला वस्त्र लगाना
चाहिए ।

सभी दिशाओं में तिकोनी ध्वजाएँ लगानी चाहिये । पूर्व में
पीली, अग्निकोण में लाल, दक्षिण में काली, नैऋत्य में नीली,
पच्छिम में सफेद, वायव्य में धूमिल, उत्तर में हरी, ईशान में सफेद
लगानी चाहिये । दो ध्वजाएँ ब्रह्मा और अनन्त की विशेष
होती है, ब्रह्मा की लाल ध्वजा ईशान में और अनन्त की पीली
ध्वजा नैऋत कोण में लगानी चाहिए ।

इन ध्वजाओं में
सुविधानुसार वाहन और आयुध भी चित्रित किये जाते हैं ।

ध्वजा की ही तरह पताकाएं भी लगाई जाती है इन पताकाओं
की दिशा और रङ्ग भी ध्वजाओं के समान ही हैं । पताकाएं
चौकोर होती हैं । एक सबसे बड़ा महाध्वज सबसे उँचा होता है ।

मण्डप के भीतर चार दिशाओं में चार वेदी बनती हैं । ईशान में ग्रह
वेदी, अग्निकोण में योगिनी वेदी, नैऋत्य में वस्तु वेदी और
वायव्य में क्षेत्रपाल वेदी, प्रधान वेदी पूर्व दिशा में होनी
चाहिए ।

एक कुण्डी यज्ञ में मण्डप के बीच में ही कुण्ड होता है । उसमें
चौकोर या कमल जैसा पद्म कुण्ड बनाया जाता हैं । कामना
विशेष से अन्य प्रकार के कुण्ड भी बनते हैं । पंच कुण्डी यज्ञ में
आचार्य कुण्ड बीच में, चतुरस्र पूर्व में, अर्थचन्द्र दक्षिण में, वृत
पच्छिम में और पद्म उत्तर में होता है ।

नव कुण्डी यज्ञ में आचार्य
कुण्ड मध्य में चतुररसा्र कुण्ड पूर्व में, योनि कुण्ड अग्नि कोण में,
अर्धचन्द्र दक्षिण में, त्रिकोण नैऋत्य में वृत पच्छिम में, षडस्र
वायव्य में, पद्म उत्तर में, अष्ट कोण ईशान में होता है ।

प्रत्येक कुण्ड में ३ मेखलाएं होती हैं । ऊपर की मेखला ४ अंगुल,
बीच की ३ अंगुल, नीचे की २ अँगुल होनी चाहिए ।

ऊपर की
मेखला पर सफेद रङ्ग मध्य की पर लाल रङ्ग और नीचे की पर
काला रङ्ग करना चाहिए ।

५० से कम आहुतियों का हवन करना
हो तो कुण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं ।

भूमि पर मेखलाएं
उठाकर स्थाण्डिल बना लेना चाहिए ।

५० से ९९ तक आहुतियों
के लिए २१ अंगुल का कुण्ड होना चाहिए ।

१०० से ९९९ तक के
लिए २२.५अँगुल का, एक हजार आहुतियों के लिए २ हाथ=
(१.५)फुट का, तथा एक लाख आहुतियों के लिए ४ हाथ (६
फुट)का कुण्ड बनाने का प्रमाण है ।

यज्ञ-मण्डप में पच्छिम द्वार से साष्टाङ्ग नमस्कार करने के
उपरान्त प्रवेश करना चाहिए । हवन के पदार्थ चरु आदि पूर्व
द्वार से ले जाने चाहिए । दान की सामग्री दक्षिण द्वार से
और पूजा प्रतिष्ठा की सामग्री उत्तर द्वार से ले जानी
चाहिए ।

कुण्ड के पिछले भाग में योनियों बनाई जाती है । इनके सम्बन्ध में
कतिपय विद्वानों का मत है कि वह वामार्गी प्रयोग है ।

योनि को स्त्री की मूत्रेन्दि्रय का आकार और उसके उपरिभाग
में अवस्थित किये जाने वाले गोलकों को पुरुष अण्ड का चिह्न
बना कर वे इसे अश्लील एवं अवैदिक भी बताते हैं ।

अनेक
याज्ञिक कुण्डों में योनि-निर्माण के विरुद्ध भी हैं और योनि-
रहित कुण्ड ही प्रयोग करते हैं ।

योनि निर्माण की पद्धति
वेदोक्त है या अवैदिक, इस प्रश्न पर गम्भीर विवेचना अपेक्षणीय
है ।

लम्बाई, चौड़ाई, सब दृष्टि से चौकोर कुण्ड बनाने का कुण्ड
सम्बन्धी ग्रन्थों में प्रमाण है । अनेक स्थानों पर ऐसे कुण्ड बनाये
जाते हैं, जो लम्बे चौड़े और गहरे तो समान लम्बाई के होते हैं, पर वे
तिरछे चलते हैं और नीचे पेंदे में जाकर ऊपर की अपेक्षा चौथाई-
चौड़ाई में रह जाते हैं । इसके बीच में भी दो मेखलाएं लगा दी
जाती हैं । इस प्रकार बने हुए कुण्ड अग्नि प्रज्ज्वलित करने तथा
शोभा एवं सुविधा की दृष्ठि से अधिक उपयुक्त हैं ।

आर्य
समाजों में ऐसे ही हवन-कुण्ड बनाये जाते हैं । इनके किनारे-
किनारे एक पतली नाली भी होती है जिसमें चींटी आदि
कीड़े-मकोड़ों का अग्नि तक न पहुँचने देने की रोक रहती है ।

कुण्ड के आस-पास जल-सिंचन इसी उद्देश्य के लिए ही किया
जाता है ।..

Friday, July 3, 2015

महेश्वर सूत्र की व्याख्या

***********
महेश्वर सूत्र की व्याख्या :::
***********
उपर्युक्त्त १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों
(अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार
से संयोजित किया गया है। फलतः, महर्षि
पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या
नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण
समूहों (एक से अधिक) के प्रयोग की
आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों)
को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर
संक्षेप मे ग्रहण करते हैं। माहेश्वर सूत्रों को
इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी
कहते हैं। प्रत्याहार बनाने की विधि तथा
संस्कृत व्याकरण मे उनके बहुविध प्रयोगों को
आगे दर्शाया गया है।
इन १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों
को समावेश किया गया है। प्रथम ४ सूत्रों
(अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष १०
सूत्र व्यञ्जन वर्णों की गणना की गयी है।
संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यञ्जन
वर्णों को हल् कहा जाता है। अच् एवं हल्
भी प्रत्याहार हैं।
“प्रत्याहार” का अर्थ होता है – संक्षिप्त
कथन। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के
प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन
सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार
बनाने की विधि का श्री पाणिनि ने
निर्देश किया है।
आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः)
आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण
(सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है
जो आदि वर्ण एवं इत्सञ्ज्ञक अन्तिम वर्ण
के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में
(collectively) बोध कराता है।
उदाहरण: =
अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि
वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम
वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार
बनता है। यह अच् प्रत्याहार अपने आदि
अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने
वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध
कराता है। अतः,
अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।
इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि 5वें
सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ‘ह’ को अन्तिम
१४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर ल् के साथ
मिलाने (अनुबन्ध) से होती है। फलतः,
हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध,
ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स,
ह।
उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण की
इत् संज्ञा श्री पाणिनि ने की है। इत्
संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का
उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल
अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है,
लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी
गणना नही की जाती है अर्थात् इनका
प्रयोग नही होता है। किन वर्णों की इत्
संज्ञा होती है, इसका निर्देश श्री
पाणिनि ने निम्नलिखित सूत्रों द्वारा
किया है ->
।
। अइउण्।। १।।

अकारो ब्रह्मरूपः स्यान्निर्गुणः सर्ववस्तुषु।
चित्कलामिं समाश्रित्य जगद्रूप
उणीश्वरः।। ३।।

अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमेश्वरः।
आद्यमन्त्येन संयोगादहमित्येव जायते।। ४।।

सर्वं परात्मकं पूर्वं ज्ञप्तिमात्रमिदं जगत्।
ज्ञप्तेर्बभूव पश्यन्ती मध्यमा वाक ततः
स्मृता।। ५।।

वक्त्रे विशुद्धचक्राख्ये वैखरी सा मता ततः।
सृष्ट्याविर्भावमासाद्य मध्यमा वाक समा मता।। ६।।

अकारं सन्निधीकृत्य जगतां कारणत्वतः।
इकारः सर्ववर्णानां शक्तित्वात् कारणं
गतम्।। ७।।

जगत् स्रष्टुमभूदिच्छा यदा
ह्यासीत्तदाऽभवत्।
कामबीजमिति प्राहुर्मुनयो वेदपारगाः।।
८।।
अकारो ज्ञप्तिमात्रं
स्यादिकारश्चित्कला मता।
उकारो
विष्णुरित्याहुर्व्यापकत्वान्महेश्वरः।। ९।।

।। ऋऌक्।। २।।
ऋऌक् सर्वेश्वरो मायां मनोवृत्तिमदर्शयत्।
तामेव वृत्तिमाश्रित्य जगद्रूपमजीजनत्।।
१०।।
वृत्तिवृत्तिमतोरत्र भेदलेशो न विद्यते।
चन्द्रचन्द्रिकयोर्यद्वद् यथा वागर्थयोरपि।।
११।।
स्वेच्छया स्वस्य चिच्छक्तौ
विश्वमुन्मीलयत्यसौ।
वर्णानां मध्यमं क्लीबमृऌवर्णद्वयं विदुः।।
१२।।
।

। एओङ्।। ३।।
एओङ् मायेश्वरात्मैक्यविज्ञानं सर्ववस्तुषु।
साक्षित्वात् सर्वभूतानां स एक इति
निश्चितम्।। १३।।

।। ऐऔच्।। ४।।
ऐऔच् ब्रह्मस्वरूपः सन् जगत् स्वान्तर्गतं ततः।
इच्छया विस्तरं
कर्त्तुमाविरासीन्महामुनिः।। १४।।

।। हयवरट्।। ५।।
भूतपञ्चकमेतस्माद्धयवरण्महेश्वरात्।
व्योमवाय्वम्बुवह्न्याख्यभूतान्यासीत् स एव
हि।। १५।।

हकाराद् व्योमसंज्ञं च यकाराद्वायुरुच्यते।
रकाराद्वह्निस्तोयं तु वकारादिति सैव
वाक्।। १६।।
।

। लण्।। ६।।
आधारभूतं भूतानामन्नादीनां च कारणम्।
अन्नाद्रेतस्ततो जीवः
कारणत्वाल्लणीरितम्।। १७।।

।। ञमङणनम्।। ७।।
शब्दस्पर्शौ रूपरसगन्धाश्च ञमङणनम्।
व्योमादीनां गुणा ह्येते जानीयात्
सर्ववस्तुषु।। १८।।

।। झभञ्।। ८।।
वाक्पाणी च
झभञासीद्विराड्रूपचिदात्मनः।
सर्वजन्तुषु विज्ञेयं स्थावरादौ न विद्यते।।
वर्गाणां तुर्यवर्णा ये कर्मेन्द्रियमया हि
ते।। १९।।

।
। घढधष्।। ९।।
घढधष् सर्वभूतानां पादपायू उपस्थकः।
कर्मेन्द्रियगणा ह्येते जाता हि
परमार्थतः।। २०।।

।। जबगडदश्।। १०।।
श्रोत्रत्वङ्नयनघ्राणजिह्वाधीन्द्रियपञ्चक
सर्वेषामपि जन्तूनामीरितं जबगडदश्।। २१।।

।। खफछठथचटतव्।। ११।।
प्राणादिपञ्चकं चैव मनो बुद्धिरहङ्कृतिः।
बभूव कारणत्वेन खफछठथचटतव्।। २२।।

वर्गद्वितीयवर्णोत्थाः प्राणाद्याः पञ्च
वायवः।
मध्यवर्गत्रयाज्जाता अन्तःकरणवृत्तयः।।
२३।।

।
। कपय्।। १२।।
प्रकृतिं पुरुषञ्चैव सर्वेषामेव सम्मतम्।
सम्भूतमिति विज्ञेयं कपय् स्यादिति
निश्चितम्।। २४।।

।। शषसर्।। १३।।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणानां त्रितयं पुरा।
समाश्रित्य महादेवः शषसर् क्रीडति
प्रभुः।। २५।।

शकारद्राजसोद्भूतिः
षकारात्तामसोद्भवः।
सकारात्सत्त्वसम्भूतिरिति
त्रिगुणसम्भवः।। २६।।

।। हल्।। १४।।
तत्त्वातीतः परं साक्षी
सर्वानुग्रहविग्रहः।
अहमात्मा परो हल् स्यामिति
शम्भुस्तिरोदधे।। २७।।

Friday, February 20, 2015

चाणक्यनीति

सानंदं सदनं सुता: च सुधिय: कान्ता प्रियं भाषते
सन्मित्रं सुधनं स्वयोषितिरति: आज्ञापरा: सेवका: ।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधो: संगमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रम: ॥

                (चाणक्यनीति)

आनंददायक घर, बुद्धिशाली संतान , मीठा बोलनेवाली पत्नी , अच्छे दोस्त , पवित्र धन , प्रियतमा पत्नी आज्ञापालक नौकर , आतिथ्य , प्रभु भक्ति , सात्विक भोजन और सत्संग जीनके जीवन में हो उनका गृहस्थाश्रम धन्य है ।
       ।। गोपाल भट्ट ।।

Saturday, February 14, 2015

प्रातःकालीन मन्त्र :---!!!
==========================
भागः--01

शैय्या त्याग से पूर्व इन मन्त्रों का उच्चारण करते हुए ईश्वर का धन्यवाद करें---

ओम् प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना।
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हवेम।।1।।
(ऋग्वेदः--7.41.1)

अर्थः—प्रभात वेला में स्वप्रकाश स्वरूप परमैश्वर्य के दाता और परमैश्वर्ययुक्त प्राण-उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान् ! सूर्य-चन्द्र को जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की हम स्तुति करते हैं और भजनीय ऐश्वर्ययुक्त पुष्टिकर्त्ता अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करने वाले अन्तर्यामी प्रेरक और पापियों को रुलाने और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की हम स्तुति करते हैं।

ओम् प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता।
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद् राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह।।2।।
(ऋग्वेदः--7.41.2)

अर्थः—हे सर्वशक्तिमान् ! महातेजस्वी परमेश्वर ! आपकी महिमा को कौन जान सकता है ? आपने सूर्य,चन्द्र, बुध, बृहस्पति, मंगल और शुक्रादि लोकों को बनाया है। इन सबको आपने धारण किया है। उनमें बसने वाले प्राणियों के गुण, कर्म, स्वभाव को आप ही जानते हैं। उनको सुख देते हैं। हे महासमर्थ प्रभु ! आपको हम प्रातःकाल में स्मरण करते हैं। वेद-मन्त्रों द्वारा आप हमें अपने स्मरण का प्रकार भी बता रहे हैं, यह आपकी अपार कृपा है।

ओम् भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः।
भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिनृवन्तः स्याम।।3।।
(ऋग्वेदः--7.41.3)

अर्थः---हे भजनीय स्वरूप ! सबके उत्पादक सत्याचार में प्रेरक ऐश्वर्यप्रद !सत्यधन को देने वाले सत्याचरण करने वालों को ऐश्वर्यदाता आप परमेश्वर ! हमको इस प्रज्ञा को दीजिए और उसके दान से हमारी रक्षा कीजिए। आप गाय आदि और घोडे आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को हमारे लिए प्रकट कीजिए। हे प्रभु ! आपकी कृपा से हम लोग उत्तम मनुष्यों से बहुत वीर मनुष्य वाले अच्छे प्रकार होवें।

ओम् उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्।
उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम।।4।।
(ऋग्वेदः--7.41.4)

अर्थः---हे भगवन् ! आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इस समय प्रकर्षता, उत्तमता की प्राप्ति में और दोनों के मध्य में ऐश्वर्ययुक्त शक्तिमान् होवें। हे परमपूज्यनीय प्रभु ! बहुधन देने वाले, सूर्यलोक के उदय में पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप लोगों की अच्छी उत्तम प्रज्ञा और सुमति में हम लोग सदा प्रवृत्त रहें।

ओम् भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम।
तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुर एता भवेह ।।5।।
(ऋग्वेदः--7.41.5)

अर्थः---हे सकलैश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर ! जिससे हम आपकी सब सज्जन निश्चय करके प्रशंसा करते हैं, सो आप हे ऐश्वर्यप्रद ! इस संसार और हमारे गृहस्थ आश्रम में अग्रगामी और आगे-आगे सत्यकर्मों में हमें बढाइये।
[10/24, 3:54 PM] Yogesh Sharma: (5.) अथ अतिथियज्ञः
=================

तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्योSतिथिर्गृहानागच्छेत्।।1।।
स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वा वात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथाSस्त्विति।।2।। (अथर्व. 15.11.1-2)
जब पूर्ण विद्वान् परोपकारी, सत्योपदेशक, गृहस्थों के घर आवें, तब गृहस्थ लोग स्वयं समीप जाकर उक्त विद्वान् को प्रणाम आदि करके उत्तम आसन पर बैठाकर पूछें कि कल के दिन कहाँ आपने निवास किया था। हे ब्रह्मन्, जलादि पदार्थ जो आपको अपेक्षित हों ग्रहण कीजिए, और हम लोगों को सत्योपदेश से तृप्त कीजिए।
जो धार्मिक, परोपकारी, सत्योपदेशक, पक्षपातरहित, शान्त सर्वहितकारक विद्वानों की अन्नादि से सेवा एवं उनसे प्रश्नोत्तर आदि करके विद्या प्राप्त करना अतिथियज्ञ कहाता है, उसको नित्यप्रति किया करें।
इन पाँच महायज्ञों को स्त्री-पुरुष प्रतिदिन करते रहें।

भोजन-मन्त्रः
=========

ओम् अन्नपतेSन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।
प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।। (यजुः—11.83)

यज्ञोपवीत-मन्त्रः
==================

ओं यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।1।।
(पार.गृह्य.2.2.11)
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।।2।। (पार.गृह्य. 2.2.11)

महामृत्युञ्जय-मन्त्रः
=================

ओम् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।। (यजुः—3)

राष्ट्रिय-प्रार्थना
===============

ओम् आ ब्रह्मन् ब्रह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूरSइषव्योSतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नSओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।। (यजुः—22.22)

ब्रह्मन्, स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म-तेजधारी।
क्षत्रिय महारथी हों अरिदल-विनाशकारी।।
होवें दुधारू गौएँ पशु आश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही।।
बलवान् सभ्य योद्धा यजमान-पुत्र होवें।
इच्छानुसार वर्षे पर्जन्य ताप धोवें।।
फल-फूल से लदी हों औषध अमोघ सारी।
हो योगक्षेमकारी स्वाधीनता हमारी।।

यज्ञप्रार्थना
=============

पूजनीय प्रभो, हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए।
छोड देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए।।
वेद की बोलें ऋचाएँ सत्य को धारण करें।
हर्ष में हों मग्न सारे शोक-सागर से तरें।।
अश्वमेधादिक रचाएँ विश्व के उपकार को।
धर्म-मर्यादा चलाकर लाभ दें संसार को।।
नित्य श्रद्धा-भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें।
रोग-पीडित विश्व के संताप को हरते रहें।।
भावना मिट जाए मन से पाप अत्याचार की।
कामनाएँ पूर्ण होवें यज्ञ से नर-नारि की।।
लाभकारी हो हवन हर प्राणधारी के लिए।
वायु जल सर्वत्र हों शुभ गन्ध को धारण किए।।
स्वार्थ-भाव मिटे हमारा प्रेमपथ विस्तार हो।
इदन्न मम का सार्थक प्रत्येक में व्यवहार हो।।
हाथ जोडकर मस्तक वन्दना हम कर रहे।
"नाथ" करुणारूप करुणा आपकी सब पर रहे।।

Thursday, February 5, 2015

मंगलाष्टका


ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ,
वायुमर्हेन्द्रोऽनलः ।
चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण,
प्रताधिपादिग्रहाः ।
प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः,
चिन्तामणिः कौस्तुभः,
स्वामी शक्तिधरश्च लाङ्गलधरः,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥१॥

गङ्गा गोमतिगोपतिगर्णपतिः,
गोविन्दगोवधर्नौ,
गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता,
गङ्गाधरो गौतमः ।
गायत्री गरुडो गदाधरगया,
गम्भीरगोदावरी,
गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु
वो मङ्गलम्॥२॥

नेत्राणां त्रितयं
महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं,
तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं
च रामत्रयम् । गङ्गावाहपथत्रयं
सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्,
संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥३॥

बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः,
व्यासोवसिष्ठो भृगुः,
जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ,
गर्गोऽ गिरा गौतमः ।
मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो,
धन्यो दिलीपो नलः,
पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥४॥

गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा,
कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च
सरस्वती च सुरभिः,
सत्यव्रतारुन्धती ।
स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी,
दुःस्वप्नविध्वंसिनी,
वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥५॥

गङ्गा सिन्धु
सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा,
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया,
चमर्ण्वती वेदिका ।
शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी,
ख्याता च या गण्डकी,
पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥६॥

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा,
धन्वन्तरिश्चन्द्रमा,
गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो,
रम्भादिदेवांगनाः ।
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः,
शंखो विषं चाम्बुधे,
रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं,
कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥७॥

ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः,
सूयोर् ग्रहाणां पतिः,
शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः,
स्कन्दश्च सेनापतिः ।
विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः,
तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते
पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु
वो मङ्गलम्॥८॥

Wednesday, January 28, 2015

सनातन के धर्म का कोई अंत नहीं इसे जितना जानना चाहोगे उतना ही विस्तृत होता जाता है, सनातन धर्म में पृथ्वी का सेण्टर अर्थात मध्य भी बताया गया है परन्तु आज के विज्ञान को पृथ्वी का मध्य नहीं मालूम पर सनातन धर्म कहता है की पृथ्वी का मध्य इलावृत देश है जिसे जम्ब्भू द्वीप भी कहते है जिसका आकार आधे चन्द्रमा के सामान है इसके मध्य में मेरु पर्वत है जो वैगर धुय और अग्नी के सामान है जो देखने पर स्वच्छ सीसे के सामान है अर्थात दिखाए नहीं देता परन्तु इस मेरु पर्वत के आर-पार कोई भी रोशनी जा नहीं सकती चाहे वह सूर्य या नक्षत्र की ही क्यों ना रोशनी हो यही इसका प्रमाण है

इस समय यह मेरु पर्वत और इलावृत देश को बरमूडा के नाम से जाना जाता है जिसका आकार चन्द्रमा के सामान है और ठीक उसके मध्य में मेरु रूपी आज का BLACK HOLE है आज का जो BLACK HOLE है वह विष्णु जी का नाभी है जिसे ठीक ऊपर चौरासी हजार योजन अर्थात 1092000 KM ऊपर ३२ हजार योजन अर्थात 416000 KM विस्तृत प्याले के आकार में वह मेरु के शिखर पर फैला हुआ है

यही से सारे पृथ्वी के बारे में बताया गया है जिसे दिशा के द्वारा समझाया गया है सनातन धर्म में हर चीज को करने का एक सिद्धांत दिया गया है अगर आप पुराण के वक्ता है तो पुराण वक्ता का मुख उत्तर दिशा में होना चाहिय और सुनाने वाले का मुख दक्षिण दिशा में इसी तरह अगर किसी और धर्म के प्रवक्ता है तो वाचक का मुख पूर्व के तरफ और श्रोता का मुख पच्छिम के तरफ होना चाहिय

अकाशा गंगा मेरु पर्वत के ऊपर से चार भागों में विभाजित होकर पृथ्वी पर गिरती है जिसे आजकल बरमूडा का ट्रैंगल कहा जाता है जिसमे गिराने वाले कोई भी जीव वापिस नहीं मिलता 
पृथ्वी के सबसे अंतिम सिरा लोकालोक पर्वत है जिसे पुष्कर द्वीप भी कहते है जहा मनुष्यों को पहुचना अत्यंत कठिन है, अगर पहुंच भी गए तो वहा तप करना अत्यंत कठिन है इससे भी अत्यंत कठिन वहा दान देना है यही पर ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ट पुष्कर है जिसे आजकल Ni'ihau iceland निहओ आइजलैंड कहते है इसके आगे ब्रह्मा का अण्डकटाह है जो सभी और से अन्धेरा है इसमें कोई भी जीव जंतु नहीं पाये जाते ठीक इसी के ऊपर सूर्य की स्थिति है जिसे आजकल Ka'ula iceland कउला आइजलैंड कहते है यही तक पृथ्वी का विस्तार है।।।   
                शेष: पुन:
      ~(कुछ और जानकारी हो तो बताएं)
            संकलन:श्रीव्रजेशभाई

Tuesday, January 13, 2015

दान की महिमा

[7:11AM, 14/01/2015] Gopal Bhatt: इस साल मकर सक्रांति का वाहन गज (हाथी)है उपवाहन गदर्भ है जिन्हो ने लाल वस्त्र पहने हुए हे इनकी जाती पशु हे गोरोचन का तीलक कीया है  वो बेठी हुइ है दुध पी रही हे बैल्व पुष्प जिन्हो ने धारण कीया है गोमेद इन्का आभुषण है  वार का नाम मंदाकीनी है नक्षत्र का नाम महोदरी है सामुदाय मुहुर्त 30 साम्यार्घ है
            पुर्व मेसे आते  हुवै पश्चीम की ओर जा रही हे  जीस कारण पुर्व ओर वायव्य के लोगो को   सुखाकारी मीले  सक्रांति के  लिए एसा माना जाता है की  जिस जिस चिजो के एवम व्यकित के साथ इन्का  सबंध  होता है वो चीज महेंगी होने के  साथ  इन व्यकित को त्रास  होता है  30 मुहुर्त की सक्रान्ती होने के कारण इस  साल बारीष अच्छा गीरेगा  हाथी गदर्म जेसे पशु मे रोग हो सकता है गेहु के एवम  सिसा के व्यवसाय मै कमी आये तांबा ओर लाल धातु के भाव मे बढोतरी आये पशु ओ की अनेक जाती  लुप्त होती दीखे  इन पशु ओ के लीये सामाजीक जागृती लाना संभव है गौवंश बचाने के  लिए  बचाव अभीयान जरुरी रहेगा वयोवृध्ध वयस्को के लीए अपनी तकेदारी रखना जरुरी रहेगा
इन सक्रान्ती काल मै तील का ज्यादा महत्व होने के कारण खाने मे तील का उपयोग तिल का हवन  तिल का दान तिल मिश्रीत जल का स्नान  तांबै का बर्तन का दान गाय माता को गो ग्रास नया वस्त्र सीजन का फल बैर का दान साबुत हरे मुंग एवम चावल  का दान  ऐवम शिव पुजन और  सुर्य देव को दुध का अर्घ्य पुजन  श्रेष्ठ रहेगा
इस साल सुर्यनारायणदेव मकर राशी मे 14 तारीख को  शाम 7 बजकर26मीनीट को प्रवेश करते है तो
        दान का पुण्यकाल तारीख 15 को सुर्योदय से लेकर   सुर्यास्त तक रहेगा

राशी के अनुसार
        मीथुन कन्या एवम कुंभ राशी के जातक को
         घी,शक्कर  सफेद तल सफेद कापड  एवम चांदी का दान करना
        कर्क वृश्चिक और मीन राशी के जातक को
         काला तिल स्टील का बर्तन ऑर काले वस्त्र की जोडी का दान
        मेष सींह एवम मकर  वाले जातक को
          साबुत गेहु  गुड लाल कापड  तील के साथ तांबे के बर्तन की जोड
         वृषभ धन एवम तुला राशी के जातक को
           चणे की दाल पीला कापड एवम पीतांबर का दान  साथ मे पीतल के थाली कटोरी एवम लोटा के साथ का पद दान  करना श्रेष्ठ रहेगा
सक्रांत काल मे दीया हुआ दान  सर्व श्रेष्ठ माना गया है

नमामी देवी नर्मदे
[7:13AM, 14/01/2015] Gopal Bhatt: दान की महिमा
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे।।
मनुस्मृति(१।८६)-के अनुसार सत्ययुगमें तप, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञकर्म तथा कलियुगमें केवल एक कार्य-दान ही श्रेष्ठ हैं।अतएव कलियुगमें मनुष्य को दान अवश्य करना चाहिए। कलियुगमें दान श्रेष्ठ हैं